छात्रों की सुविधा के लिए हमने Bihar Board Class 8 History Chapter 3 Question Answer NCERT Solutions को बहुत ही सरल भाषा में तैयार किया है।
क्या आप जानते हैं कि 1765 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल की दीवानी मिली, तो भारत की समृद्ध ग्रामीण अर्थव्यवस्था अचानक संकट के गहरे कुएं में कैसे गिर गई? bihar board class 8 history chapter 3 solution hindi के इस विशेष लेख में हम उस दर्दनाक कहानी को समझेंगे जब खेतों में खुशहाली की जगह नील के दाग लग गए थे। यह अध्याय न केवल आपको आपकी परीक्षा के लिए तैयार करेगा, बल्कि भारत के औपनिवेशिक इतिहास की गहरी समझ भी देगा।
कंपनी दीवान बन गई: सत्ता का परिवर्तन
12 अगस्त 1765 को मुग़ल बादशाह ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल का दीवान तैनात किया। रॉबर्ट क्लाइव के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि थी। दीवान बनने का अर्थ था कि अब कंपनी बंगाल के विशाल भूभाग के आर्थिक मामलों की मुख्य शासक बन गई थी।
कंपनी का मुख्य उद्देश्य अपनी व्यापारिक जरूरतों को पूरा करना और अधिक से अधिक राजस्व इकट्ठा करना था। 1765 से पहले कंपनी ब्रिटेन से सोने और चाँदी का आयात करती थी, लेकिन अब बंगाल से मिलने वाले पैसे से ही वे सामान खरीदकर निर्यात करने लगे इसका परिणाम यह हुआ कि बंगाल की अर्थव्यवस्था एक गहरे संकट में फँस गई। कारीगर गाँव छोड़कर भागने लगे क्योंकि उन्हें कम कीमत पर सामान बेचने के लिए मजबूर किया जाता था।
राजस्व व्यवस्था: तीन प्रमुख प्रणालियाँ
खेती में सुधार और राजस्व वसूली के लिए कंपनी ने समय-समय पर तीन मुख्य व्यवस्थाएं लागू कीं:
- स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement): इसे 1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस ने लागू किया। इसमें राजाओं और तालुकदारों को ज़मींदार माना गया और राजस्व की राशि हमेशा के लिए तय कर दी ।
- महालवारी बंदोबस्त: होल्ट मैकेंजी ने इसे 1822 में उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में लागू किया। यहाँ ‘महाल’ (गाँव या ग्राम समूह) को राजस्व की इकाई माना गया।
- मुनरो व्यवस्था (रैयतवारी): दक्षिण भारत में लागू की गई इस व्यवस्था में सीधा समझौता किसानों (रैयतों) के साथ किया गया, क्योंकि वहाँ पारंपरिक ज़मींदार नहीं थे।
नील की खेती और विद्रोह का उदय
यूरोप में औद्योगिक क्रांति के कारण भारतीय नील की मांग बहुत बढ़ गई क्योंकि इससे चमकदार नीला रंग मिलता था। कंपनी ने किसानों को नील उगाने के लिए मजबूर करने हेतु ‘निज’ और ‘रैयती’ प्रणालियाँ अपनाईं।
किसानों को कम ब्याज पर कर्ज देकर अनुबंध (सट्टा) कराया जाता था। नील की खेती से ज़मीन की उर्वरता खत्म हो जाती थी, जिसके कारण किसान धान नहीं उगा पाते थे। अंततः मार्च 1859 में बंगाल में “नील विद्रोह” की शुरुआत हुई।
- 1770 के अकाल ने बंगाल की एक-तिहाई आबादी को खत्म कर दिया था।
- नील का पौधा मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय (Tropical) इलाकों में उगता है।
- स्थायी बंदोबस्त के समय लॉर्ड कॉर्नवालिस बंगाल के गवर्नर-जनरल थे।
- 1810 तक ब्रिटेन द्वारा आयात किए गए नील में 95% हिस्सा भारतीय नील का था।
- महात्मा गांधी ने 1917 में चंपारण जाकर नील बागान मालिकों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया।
- दीवान: भू-राजस्व वसूलने वाला मुख्य अधिकारी
- महाल: ब्रिटिश दस्तावेजों में राजस्व की एक इकाई (गाँव या गाँवों का समूह)
- रैयत: किसान या काश्तकार
- बाग़ान: एक विशाल खेत जिस पर मालिक जबरन काम करवाता था
- सट्टा: नील उगाने के लिए किया गया अनुबंध
- लठियाल: बागान मालिकों के लाठीधारी गुंडे
- बीघा: ज़मीन की एक माप (बंगाल में लगभग एक-तिहाई एकड़)
- वैट्स (हौद): नील के पौधों को किणवन के लिए रखने का पात्र
- गुमाश्ता: लगान वसूली के लिए आने वाले बागान मालिकों के एजेंट
- गुलाम: ऐसा व्यक्ति जो किसी स्वामी की संपत्ति होता है
फिर से याद करें
उत्तर:
- रैयत — किसान
- महाल — ग्राम-समूह
- निज — बागान मालिकों की अपनी ज़मीन पर खेती
- रैयती — रैयतों की ज़मीन पर खेती
उत्तर:
- (क) यूरोप में वोड उत्पादकों को नील से अपनी आमदनी में गिरावट का ख़तरा दिखाई देता था।
- (ख) अठारहवीं सदी के आख़िर में ब्रिटेन में नील की माँग औद्योगीकरण/कपास उत्पादन के कारण बढ़ने लगी।
- (ग) कृत्रिम रंगों की खोज से नील की अंतर्राष्ट्रीय माँग पर बुरा असर पड़ा।
- (घ) चंपारण आंदोलन नील बागान मालिकों के ख़िलाफ़ था।
आइए विचार करें
उत्तर: स्थायी बंदोबस्त 1793 में लागू किया गया। इसके मुख्य पहलू थे: (1) राजाओं और तालुकदारों को ज़मींदारों के रूप में मान्यता दी गई। (2) उन्हें किसानों से लगान वसूलने और कंपनी को राजस्व चुकाने का जिम्मा सौंपा गया। (3) चुकाई जाने वाली राशि स्थायी रूप से तय कर दी गई थी, जिसमें भविष्य में कभी इज़ाफ़ा नहीं होना था। (4) इसका उद्देश्य कंपनी के लिए नियमित राजस्व सुनिश्चित करना और ज़मींदारों को ज़मीन सुधारने हेतु प्रोत्साहित करना था।
उत्तर: महालवारी व्यवस्था, स्थायी बंदोबस्त से इन कारणों से अलग थी: (1) स्थायी बंदोबस्त में राजस्व ‘स्थायी’ था, जबकि महालवारी में समय-समय पर संशोधन की गुंजाइश रखी गई। (2) स्थायी बंदोबस्त में राजस्व वसूली का जिम्मा ज़मींदार का था, जबकि महालवारी में यह काम गाँव के मुखिया को सौंपा गया। (3) महालवारी में राजस्व की इकाई ‘महाल’ (गाँव का समूह) थी।
उत्तर: मुनरो व्यवस्था (रैयतवारी) की दो प्रमुख समस्याएँ थीं: (1) राजस्व अधिकारियों ने बहुत ज्यादा राजस्व तय कर दिया था, जिसे किसान चुका नहीं पा रहे थे। (2) रैयत (किसान) अपनी ज़मीन छोड़कर गांवों से भाग रहे थे, जिसके कारण कई क्षेत्रों में गाँव वीरान हो गए।
उत्तर: किसान (रैयत) नील की खेती से इसलिए कतरा रहे थे क्योंकि: (1) उन्हें नील के लिए जो कीमत मिलती थी वह बहुत कम थी। (2) कर्जों का सिलसिला कभी खत्म ही नहीं होता था। (3) नील की जड़ें बहुत गहरी होती थीं जो मिट्टी की उर्वरता सोख लेती थीं, जिससे नील की कटाई के बाद वहां धान की खेती नहीं की जा सकती थी।
उत्तर: बंगाल में नील उत्पादन धराशायी होने की मुख्य परिस्थितियां ये थीं: (1) 1859 का नील विद्रोह, जिसमें हजारों रैयतों ने खेती करने और लगान चुकाने से इनकार कर दिया। (2) बागान मालिकों के दमन के खिलाफ किसानों का हिंसक संघर्ष और बागान मालिकों का सामाजिक बहिष्कार। (3) नील आयोग की रिपोर्ट, जिसने बागान मालिकों को दोषी पाया और रैयतों को नील की खेती बंद करने की अनुमति दी।
आइए करके देखें
उत्तर: 1917 में महात्मा गांधी बिहार के चंपारण पहुंचे। उन्होंने वहां नील किसानों की दयनीय स्थिति को देखा और उनके समर्थन में सत्याग्रह शुरू किया। गांधीजी की भूमिका ने किसानों में नया उत्साह भरा और अंततः सरकार को तिनकठिया प्रथा और बागान मालिकों की ज़ोर-ज़बरदस्ती के खिलाफ कदम उठाने पड़े। यह भारत में गांधीजी का पहला सफल सत्याग्रह था।
उत्तर: समानता यह थी कि चाय/कॉफी बागानों और नील बागानों, दोनों में मज़दूरों का भारी शोषण किया जाता था। दोनों ही जगहों पर मज़दूरों को जबरन काम करने के लिए मजबूर किया जाता था और उनकी आज़ादी बहुत सीमित थी। फ़र्क यह था कि नील की खेती का असर सीधे भूमि की उर्वरता और खाद्य फसलों (धान) पर पड़ता था, जिससे अकाल जैसी स्थितियाँ पैदा होती थीं।
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Suraj Kumar Mishra