क्या आपने कभी सोचा है कि अगर समाज में कोई ताकतवर व्यक्ति किसी गरीब की जमीन हड़प ले, तो वह गरीब कहाँ जाएगा? या फिर दो राज्यों के बीच पानी के बँटवारे को लेकर झगड़ा हो जाए, तो फैसला कौन करेगा? यहीं पर न्यायपालिका की भूमिका शुरू होती है। लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए कानून का शासन जरूरी है और इस शासन को बनाए रखने का जिम्मा हमारी अदालतों पर है। आज के इस “bihar board class 8 civics chapter 4 solution hindi” विशेष लेख में हम न्यायपालिका की गहराई, उसकी स्वतंत्रता और आम आदमी तक न्याय की पहुँच को विस्तार से समझेंगे।
अध्याय 4: न्यायपालिका
1. न्यायपालिका की भूमिका (Role of Judiciary)
भारत में कानून का शासन चलता है। इसका मतलब है कि कानून सभी लोगों पर समान रूप से लागू होता है। न्यायपालिका एक ऐसी संस्था है जो इन कानूनों को लागू करती है और विवादों का निपटारा करती है। इसके कार्यों को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है:
- विवादों का निपटारा: अदालतें नागरिकों, नागरिक व सरकार, दो राज्य सरकारों और केंद्र व राज्य सरकार के बीच होने वाले विवादों को सुलझाती हैं।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review): यदि न्यायपालिका को लगता है कि संसद द्वारा पारित कोई कानून संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता है, तो वह उसे रद्द कर सकती है।
- मौलिक अधिकारों की रक्षा: यदि किसी नागरिक को लगता है कि उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो वह सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय जा सकता है।
2. स्वतंत्र न्यायपालिका क्या है?
न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ है कि विधायिका और कार्यपालिका जैसे सरकार के अन्य अंग न्यायपालिका के काम में दखल न दें। शक्तियों का बँटवारा संविधान की एक मुख्य विशेषता है। इसका मतलब है कि न्यायाधीश किसी नेता या सरकारी दबाव में आकर फैसला नहीं सुनाते। उनकी नियुक्ति और पद से हटाने की प्रक्रिया बहुत कठिन होती है, ताकि वे निर्भीक होकर न्याय कर सकें।
3. भारत में अदालतों की संरचना
भारत में अदालतों की एक एकीकृत न्यायिक व्यवस्था है। इसका अर्थ है कि ऊपरी अदालतों के फैसले निचली अदालतों को मानने पड़ते हैं। संरचना कुछ इस प्रकार है:
- सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court): यह देश की सबसे बड़ी अदालत है, जो नई दिल्ली में स्थित है। इसके मुखिया मुख्य न्यायाधीश होते हैं।
- उच्च न्यायालय (High Court): प्रत्येक राज्य का अपना उच्च न्यायालय होता है। वर्तमान में भारत में 25 उच्च न्यायालय हैं।
- निचली अदालतें (Subordinate Courts): इन्हें जिला अदालत या तहसील स्तर की अदालतें भी कहा जाता है।
4. विधि व्यवस्था की विभिन्न शाखाएँ
कानूनी विवादों को दो मुख्य श्रेणियों में बाँटा जाता है:
- फ़ौजदारी कानून (Criminal Law): यह ऐसे अपराधों से संबंधित है जिन्हें कानून में अपराध माना गया है, जैसे- चोरी, दहेज के लिए प्रताड़ना, हत्या आदि। इसमें पहले FIR दर्ज होती है और दोषी को जेल या जुर्माना हो सकता है।
- दीवानी कानून (Civil Law): इसका संबंध व्यक्ति के अधिकारों के उल्लंघन से है, जैसे- जमीन की बिक्री, किराया, तलाक आदि। इसमें प्रभावित पक्ष अदालत में याचिका दायर करता है।
- भारत का सर्वोच्च न्यायालय 26 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आया।
- कलकत्ता, बम्बई और मद्रास उच्च न्यायालय की स्थापना 1862 में हुई थी।
- जनहित याचिका (PIL) की शुरुआत 1980 के दशक में न्याय तक पहुँच बढ़ाने के लिए की गई थी।
- भारत में एकीकृत न्याय व्यवस्था है, यानी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला अंतिम होता है।
- न्यायाधीशों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप लगभग शून्य होता है।
2. बहाल करना: किसी चीज को वापस उसी स्थिति में लाना।
3. अपील (Appeal): निचली अदालत के फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देना।
4. बरी करना: आरोपों से मुक्त कर देना।
5. दहेज (Dowry): शादी के समय माँगा जाने वाला धन या सामान।
6. उल्लंघन: कानून या नियमों को तोड़ना।
7. संविधान: देश का सर्वोच्च कानून।
8. जनहित याचिका (PIL): जनहित के लिए दायर की गई कानूनी याचिका।
9. मुआवजा: नुकसान की भरपाई के लिए दिया गया धन।
10. एफआईआर (FIR): प्रथम सूचना रिपोर्ट।
NCERT अभ्यास: प्रश्न-उत्तर
उत्तर: ‘कानून का शासन’ का अर्थ है कि कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है और कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली हो, कानून से ऊपर नहीं है। हाँ, न्यायपालिका की स्वतंत्रता इस विचार का पूर्ण समर्थन करती है। यदि न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं होगी, तो शक्तिशाली लोग न्यायाधीशों पर दबाव डालकर अपने पक्ष में फैसला करवा सकते हैं, जिससे ‘कानून का शासन’ समाप्त हो जाएगा।
उत्तर:
- निचली अदालत: लक्ष्मण, उसकी माँ शकुंतला और भाई सुभाष को दोषी पाया और मौत की सजा दी।
- उच्च न्यायालय: तीनों को निर्दोष मानकर बरी कर दिया गया।
- सर्वोच्च न्यायालय: लक्ष्मण और शकुंतला को दोषी पाया और उम्रकैद दी, जबकि सुभाष को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।
उत्तर: भारत में पिरामिड जैसी अदालती संरचना है। नीचे दिए गए चित्र को समझें:
व्याख्या: सबसे ऊपर सर्वोच्च न्यायालय है जिसका फैसला पूरे देश को मानना पड़ता है। उसके नीचे राज्यों के उच्च न्यायालय आते हैं और सबसे आधार पर निचली अदालतें होती हैं जहाँ आम नागरिक सबसे पहले पहुँचता है।
उत्तर: भारत में न्याय पाना खर्चीला और समय लेने वाला काम है, जिससे गरीब लोग न्याय से वंचित रह जाते थे। 1980 के दशक में सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिका (PIL) की व्यवस्था शुरू की। इसके तहत कोई भी व्यक्ति या संस्था उन लोगों के अधिकारों के लिए अदालत जा सकती है जो खुद नहीं पहुँच सकते। एक साधारण पत्र या तार को भी PIL माना जा सकता है।
उत्तर: अदालत ने माना कि ‘जीवन के अधिकार’ (अनुच्छेद 21) का दायरा बहुत व्यापक है। कोई भी व्यक्ति अपनी आजीविका के बिना जीवित नहीं रह सकता। यदि किसी को उसके फुटपाथ या झुग्गी-झोपड़ी से बिना किसी विकल्प के हटा दिया जाता है, तो उसकी आजीविका छिन जाएगी, जिसका अर्थ उसकी जीवन की समाप्ति जैसा ही होगा। इसलिए जीविका का अधिकार जीवन के अधिकार का अनिवार्य हिस्सा है।
उत्तर: इसका अर्थ है कि यदि किसी व्यक्ति को न्याय बहुत समय बाद मिलता है, तो उस न्याय की उपयोगिता समाप्त हो जाती है। भारत में करोड़ों मामले अदालतों में लंबित हैं। कई बार पीड़ित न्याय मिलने से पहले ही दुनिया छोड़ देता है। अतः न्याय व्यवस्था में तेजी लाना अनिवार्य है ताकि लोगों का विश्वास न्यायपालिका में बना रहे। त्वरित न्याय ही वास्तविक न्याय है।
उत्तर:
- अपील: जिला अदालत के फैसले के खिलाफ राम ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की।
- बरी करना: गवाह न होने के कारण अदालत ने आरोपी को सम्मान सहित बरी कर दिया।
- मुआवजा: रेल दुर्घटना में घायल हुए लोगों को सरकार ने उचित मुआवजा देने की घोषणा की।
उत्तर: सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार ‘जीवन के अधिकार’ में भोजन का अधिकार भी शामिल है। सरकार के दायित्व निम्नलिखित हैं:
- सरकारी गोदामों में पड़े अनाज को जरूरतमंदों तक पहुँचाना।
- मिड-डे मील (दोपहर का भोजन) योजना को प्रभावी ढंग से लागू करना।
- अकाल या भुखमरी की स्थिति में राहत कार्य चलाना।
- उचित मूल्य की दुकानों (राशन कार्ड) के माध्यम से सस्ता अनाज उपलब्ध कराना।
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Suraj Kumar Mishra