Bihar Board Class 8 History Chapter 7 Solution Hindi: महिलाएँ, जाति एवं सुधार
क्या आपने कभी कल्पना की है कि आज से 200 साल पहले भारत में एक महिला या दलित वर्ग के व्यक्ति की जिंदगी कितनी चुनौतीपूर्ण रही होगी? आज हम जिस आधुनिक बिहार और भारत में सांस ले रहे हैं, जहाँ शिक्षा और समानता की बात होती है, उसे पाने के लिए हमारे समाज सुधारकों ने एक लंबा महायुद्ध लड़ा है। इस bihar board class 8 history chapter 7 solution hindi के माध्यम से हम जानेंगे कि कैसे रूढ़िवादी जंजीरों को तोड़कर एक नए समाज की नींव रखी गई।
1. समाज सुधार की पहली किरण: सती प्रथा का अंत
उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में भारतीय समाज अंधविश्वासों के घने अंधेरे में डूबा हुआ था। उस समय की सबसे बर्बर प्रथा सती प्रथा थी। राजा राममोहन राय (1772-1833) ने इस अमानवीय कृत्य के खिलाफ मोर्चा खोला। उन्होंने कलकत्ता में ब्रह्म समाज की स्थापना की।
राममोहन राय ने प्राचीन धार्मिक ग्रंथों का गहराई से अध्ययन किया और सिद्ध किया कि सती प्रथा का धर्म में कोई आधार नहीं है। उनके निरंतर प्रयासों के कारण ही 1829 में सती प्रथा पर पाबंदी लगा दी गई। उन्होंने न केवल महिलाओं के अधिकारों की बात की, बल्कि पाश्चात्य शिक्षा का भी समर्थन किया ताकि लोग जागरूक बन सकें।
2. विधवा विवाह और शिक्षा का अधिकार
सती प्रथा के बाद अगली बड़ी चुनौती विधवाओं का जीवन था। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने विधवा विवाह के पक्ष में प्राचीन ग्रंथों का प्रमाण दिया, जिसके फलस्वरूप 1856 में विधवा विवाह कानून पारित हुआ। समाज का एक बड़ा वर्ग उनका कट्टर विरोधी बन गया था, लेकिन वे पीछे नहीं हटे।
वहीं दूसरी ओर, लड़कियों की शिक्षा के लिए भी संघर्ष जारी था। जब पहली बार स्कूल खुले, तो लोगों को लगा कि स्कूल जाने से लड़कियाँ ‘अपवित्र’ हो जाएंगी। लेकिन सुधारकों ने हार नहीं मानी। महाराष्ट्र में ज्योतिराव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने निम्न जातियों और महिलाओं की शिक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
3. जाति व्यवस्था और सामाजिक समानता का आह्वान
जातिगत भेदभाव भारत की एक और बड़ी कुरीति थी। ज्योतिराव फुले ने तर्क दिया कि ‘आर्य’ विदेशी थे और उन्होंने यहाँ के मूल निवासियों को हराकर उन्हें ‘निम्न’ जाति का बना दिया। उन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना की।
बीसवीं सदी में इस आंदोलन को डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने नई दिशा दी। उन्होंने 1927 में मंदिर प्रवेश आंदोलन शुरू किया ताकि दलितों को समाज में बराबरी का हक मिल सके। दक्षिण भारत में ई.वी. रामास्वामी नायकर (पेरियार) ने आत्मसम्मान आंदोलन चलाकर ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती दी। निष्कर्ष यह है कि इन महापुरुषों ने हमें आत्मसम्मान के साथ जीना सिखाया।
- सत्यशोधक समाज: स्थापना 1873 में ज्योतिराव फुले द्वारा की गई।
- गुलामगीरी: फुले द्वारा लिखित पुस्तक जो अमेरिकी दास प्रथा विरोधी आंदोलन को समर्पित है।
- बाल विवाह निषेध अधिनियम: 1929 में पारित हुआ (शारदा एक्ट)।
- प्रार्थना समाज: 1867 में बॉम्बे में स्थापित, जिसने जाति बंधनों को तोड़ने पर बल दिया।
- सतनामी आंदोलन: मध्य भारत में घासीदास ने इसकी शुरुआत की।
- सती: वह पत्नी जो पति की चिता पर जीवित जल जाए।
- रुढ़िवादी: पुरानी परंपराओं को बिना सोचे-समझे मानने वाले।
- सुधारक: वह जो समाज की बुराइयों को दूर करने का प्रयास करे।
- अस्पृश्यता: समाज के कुछ वर्गों को अछूत मानने की बुराई।
- पुनर्विवाह: विधवा होने के बाद दोबारा विवाह करना।
- कुरीति: समाज में व्याप्त बुरी प्रथा या परंपरा।
- दीकु: आदिवासियों द्वारा बाहरी लोगों के लिए प्रयुक्त शब्द।
- ब्रह्म समाज: राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित संस्था।
- स्वावलंबन: अपने पैरों पर खड़ा होना या आत्मनिर्भर बनना।
- अधिनियम: सरकार द्वारा पारित कोई विशेष कानून।
📖 पूरे अध्याय का सुंदर सार (Summary)
यहाँ bihar board class 8 history chapter 7 solution hindi के सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों के सटीक उत्तर दिए गए हैं:
उत्तर:
- (क) जब अंग्रेज़ों ने बंगाल पर कब्ज़ा किया तो उन्होंने विवाह, गोद लेने, संपत्ति उत्तराधिकार आदि के बारे में नए कानून बना दिए। — [सही ✅]
- (ख) समाज सुधारकों को सामाजिक तौर-तरीकों में सुधार के लिए प्राचीन ग्रंथों से दूर रहना पड़ता था। — [गलत ❌]
सही तथ्य: वे प्राचीन ग्रंथों का ही प्रमाण देकर सुधारों को सही ठहराते थे। - (ग) सुधारकों को देश के सभी लोगों का पूरा समर्थन मिलता था। — [गलत ❌]
सही तथ्य: कट्टरपंथियों और रूढ़िवादी लोगों ने सुधारों का कड़ा विरोध किया था। - (घ) बाल विवाह निषेध अधिनियम 1829 में पारित किया गया था। — [गलत ❌]
सही तथ्य: यह 1929 में पारित हुआ था; 1829 में सती प्रथा पर रोक लगी थी।
उत्तर: समाज सुधारकों ने एक रणनीति के तहत प्राचीन धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया। जब भी वे किसी हानिकारक प्रथा (जैसे सती प्रथा) को बंद करना चाहते थे, तो वे ग्रंथों से ऐसे श्लोक खोजते थे जो यह साबित करें कि प्राचीन काल में यह बुराइयाँ नहीं थीं। इससे समाज और अंग्रेजों को यह विश्वास दिलाने में आसानी हुई कि सुधार वास्तव में शुद्ध धर्म की ओर वापसी है।
उत्तर: 19वीं सदी में लोगों के मन में कई डर थे:
- उन्हें लगता था कि स्कूल जाने से लड़कियाँ घर के काम नहीं करेंगी।
- सार्वजनिक स्थानों से गुजरते समय लड़कियाँ ‘अपवित्र’ हो जाएंगी।
- शिक्षित महिलाएँ जल्दी विधवा हो जाती हैं (यह उस समय का एक बड़ा अंधविश्वास था)।
- स्कूलों तक जाने के लिए उन्हें घर से बाहर निकलना पड़ता था, जो समाज को मंजूर नहीं था।
उत्तर: ज्योतिराव फुले ने तर्क दिया कि ब्राह्मण विदेशी ‘आर्य’ हैं जिन्होंने मूल निवासियों को हराकर उन्हें गुलाम बना लिया। उन्होंने कहा कि ऊंची जातियों का सत्ता पर कोई हक नहीं है क्योंकि यह धरती यहाँ के मूल निवासियों की है। उन्होंने सत्यशोधक समाज के माध्यम से यह संदेश दिया कि ईश्वर की भक्ति के लिए किसी बिचौलिए या पुजारी की आवश्यकता नहीं है, सभी समान हैं।
उत्तर: 1873 में लिखी गई पुस्तक ‘गुलामगीरी’ उन अमेरिकियों को समर्पित की गई जिन्होंने गुलामों को आजाद कराने के लिए संघर्ष किया था। फुले भारत की ‘नीच’ जातियों और अमेरिका के काले गुलामों की स्थिति में समानता देखते थे। वे यह संदेश देना चाहते थे कि पूरी दुनिया में जहाँ भी शोषण होता है, उसके खिलाफ संघर्ष करना ही मानवता है।
उत्तर: डॉ. अम्बेडकर मंदिर प्रवेश के माध्यम से यह दिखाना चाहते थे कि समाज में जातिगत पूर्वाग्रह कितने गहरे हैं। वे दलितों के मन में आत्मसम्मान जगाना चाहते थे। उनका लक्ष्य केवल मंदिर में प्रवेश पाना नहीं था, बल्कि समाज को यह अहसास कराना था कि सभी मनुष्य ईश्वर की दृष्टि में समान हैं और भेदभाव अमानवीय है।
— लेख का अंत —
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Suraj Kumar Mishra