📚 Subject: Science (विज्ञान)
📝 Chapter: 7
🔖 Topic: जंतुओं और पादप में परिवहन (Transportation in Animals and Plants)
जंतुओं और पादप में परिवहन – Bihar Board Class 7 Science Chapter 7 Solutions
छात्रों, इस लेख में हम Bihar Board Class 7 Science Chapter 7 Solutions के अंतर्गत ‘जंतुओं और पादप में परिवहन’ अध्याय का विस्तार से अध्ययन करेंगे। सभी जीवों को जीवित रहने के लिए भोजन, जल और ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। उन्हें इन सभी पदार्थों को अपने शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुँचाना होता है ।
साथ ही जंतुओं को उन अंगों में उत्पन्न अपशिष्ट पदार्थों (Waste materials) का परिवहन उस स्थान तक करना होता है, जहाँ से उन्हें बाहर निकाला जा सके। मानव शरीर में हृदय और रक्त वाहिनियाँ संयुक्त रूप से परिसंचरण तंत्र (Circulatory System) बनाती हैं, जो इस कार्य को संपन्न करता है।
📘 7.1 परिसंचरण तंत्र (Circulatory System)
रक्त (Blood) क्या है?
रक्त वह तरल पदार्थ या द्रव है, जो रक्त वाहिनियों में प्रवाहित होता है। यह पाचित भोजन को छोटी आँत से शरीर के अन्य भागों तक ले जाता है। फेफड़ों से ऑक्सीजन को भी रक्त ही शरीर की कोशिकाओं तक ले जाता है। रक्त शरीर में से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने के लिए उनका परिवहन भी करता है।
रक्त एक तरल से बना है जिसे प्लाज्मा (Plasma) कहते हैं, जिसमें विभिन्न प्रकार की कोशिकाएँ निलंबित रहती हैं:
- लाल रक्त कोशिकाएँ (RBC): इनमें एक लाल वर्णक होता है, जिसे हीमोग्लोबिन (Hemoglobin) कहते हैं। हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन को अपने साथ संयुक्त करके शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचाता है। इसी की उपस्थिति के कारण रक्त का रंग लाल होता है।
- श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBC): ये कोशिकाएँ उन रोगाणुओं को नष्ट करती हैं, जो हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। (ये हमारे शरीर के सैनिक हैं)
- पट्टिकाणु (Platelets): जब हमें चोट लग जाती है, तो कुछ समय बाद रक्त का बहना रुक जाता है और थक्का (Clot) जम जाता है। रक्त का थक्का बन जाना प्लेटलेट्स की उपस्थिति के कारण होता है।
शरीर में दो प्रकार की मुख्य रक्त वाहिनियाँ पाई जाती हैं:
1. धमनियाँ (Arteries)
धमनियाँ हृदय से ऑक्सीजन समृद्ध रक्त को शरीर के सभी भागों में ले जाती हैं। चूँकि रक्त प्रवाह तेज़ी से और अधिक दाब पर होता है, अतः धमनियों की भित्तियाँ (दीवार) मोटी और प्रत्यास्थ (लचीली) होती हैं।
2. शिराएँ (Veins)
वे रक्त वाहिनियाँ, जो कार्बन डाइऑक्साइड समृद्ध रक्त को शरीर के सभी भागों से वापस हृदय में ले जाती हैं, शिराएँ कहलाती हैं। इनकी भित्तियाँ अपेक्षाकृत पतली होती हैं और इनमें वाल्व (Valves) होते हैं, जो रक्त को केवल हृदय की ओर ही प्रवाहित होने देते हैं।
नाड़ी स्पंद (Pulse) और केशिकाएँ (Capillaries):
- नाड़ी स्पंद: कलाई पर महसूस होने वाली ‘धक-धक’ की गति नाड़ी स्पंद कहलाती है, जो धमनियों में प्रवाहित हो रहे रक्त के कारण होती है। विश्राम की अवस्था में स्वस्थ व्यक्ति की स्पंदन दर सामान्यतः 72 से 80 स्पंदन प्रति मिनट होती है।
- केशिकाएँ: ऊतकों में पहुँचकर धमनियाँ अत्यधिक पतली नलिकाओं में विभाजित हो जाती हैं, जिन्हें केशिकाएँ कहते हैं। ये पुनः मिलकर शिराओं को बनाती हैं।
अपवाद: फुफ्फुस धमनी हृदय से कार्बन डाइऑक्साइड समृद्ध रक्त को फेफड़ों में ले जाती है (ऑक्सीजन नहीं), और फुफ्फुस शिरा ऑक्सीजन समृद्ध रक्त को फेफड़ों से हृदय में लाती है।
📘 हृदय (Heart) और हृदय स्पंद
हृदय वह अंग है, जो रक्त द्वारा पदार्थों के परिवहन के लिए पंप (Pump) के रूप में कार्य करता है। यह जीवनपर्यंत बिना रुके निरंतर धड़कता रहता है। हृदय वक्ष-गुहा में स्थित होता है, जिसका निचला सिरा थोड़ी बाईं ओर झुका रहता है। इसका आमाप (साइज़) लगभग आपकी मुठ्ठी के बराबर होता है।
हृदय के कक्ष (Chambers of Heart)
हृदय चार कक्षों में बँटा होता है:
- ऊपरी दो कक्ष अलिन्द (Atria) कहलाते हैं।
- निचले दो कक्ष निलय (Ventricles) कहलाते हैं।
कक्षों के बीच का विभाजन दीवार ऑक्सीजन समृद्ध रक्त और कार्बन डाइऑक्साइड से समृद्ध रक्त को परस्पर मिलने नहीं देती है।
चित्र 7.4 : मानव हृदय का काट-चित्र।
हृदय स्पंद (Heartbeat) और स्टेथोस्कोप
हृदय के कक्ष की भित्तियाँ पेशियों की बनी होती हैं। ये पेशियाँ लयबद्ध रूप से संकुचन (Contraction) और विश्रांति (Relaxation) करती हैं। यह लयबद्ध संकुचन और विश्रांति दोनों मिलकर हृदय स्पंद (Heartbeat) कहलाता है।
चिकित्सक आपके हृदय स्पंद को मापने के लिए स्टेथोस्कोप (Stethoscope) नामक यंत्र का उपयोग करते हैं, जो हृदय स्पंद की ध्वनि को आवर्धित (बड़ा) करके सुनने में मदद करता है।
रक्त परिसंचरण की खोज विलियम हार्वे (William Harvey) नामक एक अंग्रेज़ चिकित्सक ने की थी। उस समय लोगों का मानना था कि रक्त शरीर में दोलन (Oscillate) करता है। हार्वे के इस विचार का उपहास किया गया, लेकिन बाद में इसे वैज्ञानिक तथ्य के रूप में मान्यता मिल गई।
स्पंज और हाइड्रा: स्पंजों और हाइड्रा जैसे जंतुओं में कोई परिसंचरण तंत्र या रक्त नहीं पाया जाता है। वे जिस जल में रहते हैं, वही जल उनके शरीर में प्रवेश करके भोजन और ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है।
जब हमारी कोशिकाएँ अपना कार्य करती हैं, तो कुछ पदार्थ अपशिष्ट (Waste) के रूप में निर्मुक्त होते हैं। ये पदार्थ प्रायः विषाक्त (Toxic) होते हैं, इसलिए इन्हें शरीर से बाहर निकालने की आवश्यकता होती है। सजीवों द्वारा कोशिकाओं में निर्मित होने वाले अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने के प्रक्रम को उत्सर्जन (Excretion) कहते हैं।
मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System)
रक्त में उपस्थित अपशिष्ट पदार्थों को छानने की व्यवस्था वृक्क (गुर्दों / Kidneys) में होती है। जब रक्त वृक्कों में पहुँचता है, तो उपयोगी पदार्थों को पुनः अवशोषित कर लिया जाता है और अपशिष्ट पदार्थ जल में घुलकर मूत्र (Urine) के रूप में अलग हो जाते हैं।
चित्र 7.6 : मानव उत्सर्जन तंत्र (वृक्क, मूत्रवाहिनी, मूत्राशय और मूत्रमार्ग)।
- वृक्कों से, मूत्र वाहिनियों (Ureters) से होता हुआ मूत्र मूत्राशय (Urinary bladder) में जाता है, जहाँ यह संचित होता है।
- मूत्राशय से एक पेशीय नली जुड़ी होती है, जिसे मूत्रमार्ग (Urethra) कहते हैं। इसका दूसरा सिरा खुला होता है (मूत्ररंध्र), जिससे मूत्र बाहर निकाल दिया जाता है।
उत्सर्जन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य:
- कोई वयस्क व्यक्ति सामान्यतः 24 घंटे में 1 से 1.8 लीटर मूत्र करता है। मूत्र में 95% जल, 2.5% यूरिया और 2.5% अन्य अपशिष्ट उत्पाद होते हैं।
- पसीना (Sweat): पसीने में जल और लवण होते हैं। पसीना हमें अपने शरीर को ठंडा बनाए रखने में सहायता करता है।
- अपोहन (Dialysis): यदि किसी व्यक्ति के वृक्क (गुर्दे) काम करना बंद कर दें, तो कृत्रिम वृक्क द्वारा रक्त को नियमित रूप से छानकर अपशिष्ट पदार्थों को हटाया जाता है। इस विधि को डायलाइसिस कहते हैं।
अन्य जंतुओं में उत्सर्जन:
मछली जैसे जलीय जंतु अपशिष्ट उत्पादों को अमोनिया के रूप में उत्सर्जित करते हैं। पक्षी, छिपकली और सर्प जैसे जंतु अपने शरीर से अपशिष्ट पदार्थों का उत्सर्जन अर्ध-ठोस (Semi-solid) रूप में करते हैं, जो मुख्यतः श्वेत रंग का यौगिक यूरिक अम्ल (Uric Acid) होता है। मानव मुख्यतः यूरिया का उत्सर्जन करता है।
📘 7.3 पादपों में पदार्थों का परिवहन (Transport in Plants)
पौधे अपनी जड़ों (मूलों) द्वारा मृदा से जल और खनिज पोषकों का अवशोषण करके उन्हें पत्तियों तक पहुँचाते हैं। पत्तियों द्वारा निर्मित भोजन पादप के सभी भागों में भेजा जाता है।
जल और खनिजों का परिवहन (जाइलम)
मूलों (जड़ों) में मूलरोम (Root hairs) होते हैं, जो मृदा से जल और खनिजों के अवशोषण के लिए सतह क्षेत्रफल को बढ़ा देते हैं। पादपों में जल और पोषक तत्त्वों के परिवहन के लिए पाइप जैसी वाहिकाएँ (संवहन ऊतक) होती हैं, जिसे जाइलम (Xylem / दारू) कहते हैं। जाइलम जड़ों से तने के माध्यम से पत्तियों तक जल पहुँचाता है।
भोजन का परिवहन (फ्लोएम)
पत्तियाँ प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाती हैं। इस भोजन को पादप के सभी भागों में ले जाने का कार्य एक अन्य संवहन ऊतक द्वारा किया जाता है, जिसे फ्लोएम (Phloem / पोषवाह) कहते हैं।
वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) और चूषण बल
पादप वाष्पोत्सर्जन के प्रक्रम द्वारा पत्तियों के रंध्रों (Stomata) से बड़ी मात्रा में जल वाष्पित कर देते हैं। जल के वाष्पन से एक चूषण अभिकर्षण (Suction pull / खिंचाव) विकसित हो जाता है। यह विशाल वृक्षों में बहुत अधिक ऊँचाई तक जल को खींचने में मदद करता है। वाष्पोत्सर्जन पादप को ठंडा रखने में भी सहायक होता है।
📘 अभ्यास प्रश्न – Bihar Board Class 7 Science Chapter 7 Solutions
उत्तर:
| कॉलम A | कॉलम B (सही मिलान) |
|---|---|
| (क) रंध्र | (ii) वाष्पोत्सर्जन |
| (ख) जाइलम | (iv) जल का परिवहन |
| (ग) मूल रोम | (i) जल का अवशोषण |
| (घ) फ्लोएम | (iii) भोजन का परिवहन |
(नोट: कॉलम B में दिया गया विकल्प (v) कार्बोहाइड्रेट का संश्लेषण अतिरिक्त है।)
- (क) हृदय से रक्त का शरीर के सभी अंगों में परिवहन धमनियों (रक्त वाहिनियों) द्वारा होता है।
- (ख) हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाता है।
- (ग) धमनियाँ और शिराएँ केशिकाओं के जाल द्वारा जुड़ी होती हैं।
- (घ) हृदय का लयबद्ध विस्तार और संकुचन हृदय स्पंदन (Heartbeat) कहलाता है।
- (च) मानव शरीर के प्रमुख उत्सर्जित उत्पाद यूरिया है।
- (छ) पसीने में जल और लवण होता है।
- (ज) वृक्क अपशिष्ट पदार्थों को द्रव रूप में बाहर निकालते हैं, जिसे हम मूत्र कहते हैं।
- (झ) वृक्षों में बहुत अधिक ऊँचाइयों तक जल पहुँचाने के कार्य में वाष्पोत्सर्जन द्वारा उत्पन्न चूषण अभिकर्षण बल सहायता करता है।
(क) पादपों में जल का परिवहन होता है-
- ✅ (i) जाइलम के द्वारा
- (ii) फ्लोएम के द्वारा
- (iii) रंध्रों के द्वारा
- (iv) मूलरोमों के द्वारा
उत्तर की विस्तृत व्याख्या: पादपों में जड़ों (मूलों) द्वारा अवशोषित जल और खनिज लवणों को पत्तियों और पौधों के अन्य भागों तक पहुँचाने का कार्य ‘जाइलम’ (संवहन ऊतक) द्वारा किया जाता है।
(ख) मूलों द्वारा जल के अवशोषण की दर को बढ़ाया जा सकता है, उन्हें-
- (i) छाया में रखकर।
- (ii) मंद प्रकाश में रखकर।
- ✅ (iii) पंखे के नीचे रखकर।
- (iv) पॉलीथीन की थैली से ढककर।
उत्तर की विस्तृत व्याख्या: पंखे के नीचे रखने पर वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) की दर बढ़ जाती है। वाष्पोत्सर्जन जितना अधिक होगा, पत्तियों में जल की कमी उतनी तेजी से होगी, जिससे एक प्रबल ‘चूषण बल’ (Suction pull) उत्पन्न होगा और मूलों (जड़ों) द्वारा जल का अवशोषण भी बढ़ जाएगा।
उत्तर: सभी जीवों (पादपों और जंतुओं) को जीवित रहने के लिए भोजन, जल और ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। शरीर की प्रत्येक कोशिका तक इन्हें पहुँचाने के लिए पदार्थों का परिवहन आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, कोशिकाओं में जैविक क्रियाओं के दौरान उत्पन्न हानिकारक और अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने के लिए उन्हें उत्सर्जी अंगों तक पहुँचाना भी आवश्यक होता है। इसलिए पादपों और जंतुओं में एक सुव्यवस्थित परिवहन तंत्र की आवश्यकता होती है।
उत्तर: रक्त में पट्टिकाणु (प्लेटलेट्स) का मुख्य कार्य रक्त का थक्का (Blood Clot) बनाना है। यदि रक्त में पट्टिकाणु नहीं होंगे, तो चोट लगने पर शरीर से रक्त का बहना बंद नहीं होगा। लगातार रक्त बहने से शरीर में रक्त की भारी कमी हो जाएगी, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।
उत्तर: पादप की पत्तियों की सतह पर उपस्थित अत्यंत सूक्ष्म छिद्रों को रंध्र (Stomata) कहते हैं।
रंध्रों के दो मुख्य कार्य:
- गैसों का विनिमय: प्रकाश संश्लेषण और श्वसन के लिए वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और ऑक्सीजन (O₂) का आदान-प्रदान रंध्रों के माध्यम से होता है।
- वाष्पोत्सर्जन: पादप शरीर से अतिरिक्त जल को वाष्प के रूप में बाहर निकालने का कार्य (वाष्पोत्सर्जन) रंध्रों द्वारा ही संपन्न होता है।
उत्तर: हाँ, वाष्पोत्सर्जन पादपों में अत्यंत उपयोगी कार्य करता है:
1. वाष्पोत्सर्जन के कारण पत्तियों में जल की कमी हो जाती है, जिससे एक ‘चूषण अभिकर्षण’ (Suction pull/खिंचाव) उत्पन्न होता है। यह बल जड़ों द्वारा अवशोषित जल और खनिज लवणों को ऊँचे विशाल वृक्षों की पत्तियों तक पहुँचाने में सहायता करता है。
2. गर्मियों में वाष्पोत्सर्जन पादपों को ठंडा रखने (तापमान नियंत्रित करने) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उत्तर: रक्त (Blood) के मुख्य घटक निम्नलिखित हैं:
- प्लाज्मा (Plasma): रक्त का तरल भाग।
- लाल रक्त कोशिकाएँ (RBC): इनमें हीमोग्लोबिन होता है जो ऑक्सीजन का परिवहन करता है।
- श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBC): ये रोगाणुओं से लड़कर शरीर की रक्षा करती हैं।
- पट्टिकाणु (Platelets): ये रक्त का थक्का जमाने में सहायक होते हैं।
उत्तर: शरीर के सभी अंगों और उनकी कोशिकाओं को जीवित रहने और अपना कार्य सुचारू रूप से करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा उन्हें पचे हुए भोजन और ऑक्सीजन से मिलती है। रक्त ही वह तरल है जो पचे हुए भोजन और ऑक्सीजन को शरीर के हर अंग तक पहुँचाता है। साथ ही, अंगों में उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य हानिकारक अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने के लिए उत्सर्जन अंगों (फेफड़े, वृक्क आदि) तक लाने का कार्य भी रक्त ही करता है। इसलिए सभी अंगों को रक्त की आवश्यकता होती है।
उत्तर: रक्त में लाल रक्त कोशिकाएँ (Red Blood Cells – RBC) मौजूद होती हैं। इन कोशिकाओं में ‘हीमोग्लोबिन’ (Hemoglobin) नामक एक विशेष लाल वर्णक (Pigment) पाया जाता है। इसी हीमोग्लोबिन की उपस्थिति के कारण रक्त का रंग लाल दिखाई देता है।
उत्तर: हृदय (Heart) हमारे परिसंचरण तंत्र का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसके मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं:
- हृदय एक पंप की तरह कार्य करता है, जो जीवन भर बिना रुके रक्त को शरीर की रक्त वाहिनियों में प्रवाहित करता रहता है।
- यह फेफड़ों से आए हुए ऑक्सीजन समृद्ध (शुद्ध) रक्त को ग्रहण करता है और धमनियों के माध्यम से शरीर के सभी भागों तक पंप करता है।
- यह शरीर के विभिन्न भागों से आए हुए कार्बन डाइऑक्साइड समृद्ध (अशुद्ध) रक्त को शिराओं द्वारा ग्रहण करता है और उसे शुद्ध होने (ऑक्सीजन प्राप्त करने) के लिए फेफड़ों में भेजता है।
उत्तर: हमारे शरीर की कोशिकाओं में विभिन्न जैविक क्रियाओं के दौरान कुछ अपशिष्ट पदार्थ (जैसे- कार्बन डाइऑक्साइड, यूरिया आदि) बनते रहते हैं। ये पदार्थ शरीर के लिए अनावश्यक और विषाक्त (जहरीले) होते हैं। यदि इन्हें शरीर से बाहर न निकाला जाए, तो ये शरीर में जमा होकर विभिन्न बीमारियाँ उत्पन्न कर सकते हैं और व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। अतः स्वस्थ रहने के लिए अपशिष्ट पदार्थों का उत्सर्जन अत्यंत आवश्यक है।
उत्तर: छात्रों, मानव उत्सर्जन तंत्र का चित्र बनाने के लिए नीचे दिए गए आरेख का संदर्भ लें। आरेख बनाते समय निम्न अंगों का सही स्थान पर नामांकन अवश्य करें:
1. वृक्क (Kidneys), 2. मूत्रवाहिनी (Ureters), 3. मूत्राशय (Urinary Bladder), 4. मूत्रमार्ग (Urethra), 5. मूत्ररंध्र (Urinary opening)।
चित्र: मानव उत्सर्जन तंत्र का नामांकित आरेख।
शिक्षकों के लिए सुझाव: छात्रों को परिसंचरण तंत्र समझाते समय अपनी कलाई (Pulse) पकड़कर ‘नाड़ी स्पंद’ (Pulse rate) गिनने का क्रियाकलाप (7.1) कक्षा में अवश्य करवाएँ। यह उन्हें हृदय और धमनियों के कार्य को व्यावहारिक रूप से समझने में मदद करेगा। इसके अतिरिक्त, स्टेथोस्कोप के कार्य और डायलाइसिस (कृत्रिम वृक्क) के महत्व पर चर्चा करें, जिससे छात्र चिकित्सा विज्ञान की उपयोगिता से परिचित हों।
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Suraj Kumar Mishra