📚 Subject: Science (विज्ञान)
📝 Chapter: 2
🔖 Topic: प्राणियों में पोषण (Nutrition in Animals)
प्राणियों में पोषण – Bihar Board Class 7 Science Chapter 2 Solutions
छात्रों, इस लेख में हम Bihar Board Class 7 Science Chapter 2 Solutions के अंतर्गत ‘प्राणियों में पोषण’ अध्याय का विस्तार से अध्ययन करेंगे। पादप (पौधे) अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण द्वारा स्वयं बना सकते हैं परन्तु प्राणी (जंतु) ऐसा नहीं कर सकते। प्राणी अपना भोजन प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से पौधों से प्राप्त करते हैं।
मानव सहित सभी जीवों को वृद्धि करने, शरीर को स्वस्थ एवं गतिशील बनाए रखने के लिए खाद्य पदार्थों की आवश्यकता होती है। प्राणियों के पोषण में पोषक तत्त्वों की आवश्यकता, आहार के अंतर्ग्रहण (भोजन ग्रहण करने) की विधि और शरीर में इसके उपयोग की विधि सम्मिलित हैं ।
पाचन (Digestion) क्या है?
कार्बोहाइड्रेट जैसे कुछ संघटक जटिल पदार्थ हैं। अनेक जंतु इन जटिल पदार्थों का उपयोग सीधे इसी रूप में नहीं कर सकते। अतः उन्हें सरल पदार्थों में बदलना आवश्यक है। जटिल खाद्य पदार्थों का सरल पदार्थों में परिवर्तित होना या टूटना विखंडन कहलाती है तथा इस प्रक्रम को पाचन कहते हैं।
📘 2.1 खाद्य अंतर्ग्रहण की विभिन्न विधियाँ
भोजन के अंतर्ग्रहण की विधि विभिन्न जीवों में भिन्न-भिन्न होती हैं।
- मधुमक्खी एवं मर्मर पक्षी (हमिंग बर्ड) पौधों का मकरंद चूसते हैं।
- मानव एवं कुछ अन्य जंतुओं में शिशु माँ का दूध पीते हैं।
- अजगर जैसे सर्प वंश के प्राणी अपने शिकार को समूचा ही निगल जाते हैं।
- कुछ जलीय प्राणी अपने आस-पास पानी में तैरते हुए खाद्य कणों को छान कर उनका भक्षण करते हैं।
हम अपने मुख द्वारा भोजन का अंतर्ग्रहण करते हैं, इसे पचाते हैं तथा फिर उसका उपयोग करते हैं। आहार का बिना पचा भाग मल के रूप में निष्कासित किया जाता है।
भोजन एक सतत् नली से गुजरता है, जो मुख-गुहिका से प्रारम्भ होकर गुदा तक जाती है। इस नली को विभिन्न भागों में बाँट सकते हैं:
- मुख-गुहिका
- ग्रास नली या ग्रसिका
- आमाशय
- क्षुद्रांत्र (छोटी आँत)
- बृहदांत्र (बड़ी आँत) जो मलाशय से जुड़ी होती है
- मलद्वार अथवा गुदा
ये सभी भाग मिलकर आहार नाल (पाचन नली) का निर्माण करते हैं। आमाशय की आंतरिक भित्ति, क्षुद्रांत्र तथा आहार नाल से संबद्ध विभिन्न ग्रंथियाँ जैसे कि लाला-ग्रंथि, यकृत, अग्न्याशय पाचक रस स्रावित करती हैं।
📘 मुख एवं मुख-गुहिका (Mouth and Buccal Cavity)
भोजन का अंतर्ग्रहण मुख द्वारा होता है। आहार को शरीर के अंदर लेने की क्रिया अंतर्ग्रहण कहलाती है। हम दाँतों की सहायता से भोजन चबाते हैं तथा यांत्रिक विधि द्वारा उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में पीस डालते हैं।
दाँतों के प्रकार:
- कृंतक (Incisors): काटने (कर्तन) एवं दंशन के लिए।
- रदनक (Canines): खाद्य पदार्थों को चीरने (वेधन) और फाड़ने के काम आते हैं।
- अग्रचर्वणक (Premolars) और चर्वणक (Molars): चबाने एवं पीसने के काम आते हैं।
दूध के दाँत तथा स्थायी दाँत:
हमारे दाँतों का प्रथम सेट शैशवकाल में निकलता है तथा लगभग 8 वर्ष की आयु तक ये सभी दाँत गिर जाते हैं। इन्हें दूध के दाँत कहते हैं। इन दाँतों के स्थान पर दूसरे दाँत निकलते हैं, जिन्हें स्थायी दाँत कहते हैं।
जीभ और लाला-ग्रंथि
हमारे मुख में लाला-ग्रंथि होती है, जो लाला रस (लार) स्रावित करती है। लाला रस चावल के मंड को शर्करा में बदल देता है। जीभ एक माँसल पेशीय अंग है, जो पीछे की ओर मुख-गुहिका के अधर तल से जुड़ी होती है। हम बोलने के लिए जीभ का उपयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त यह भोजन में लार को मिलाने का कार्य करती है तथा निगलने में भी सहायता करती है। जीभ पर स्वाद-कलिकाएँ होती हैं, जिनकी सहायता से हमें विभिन्न प्रकार के स्वाद का पता चलता है।
📘 भोजन नली (ग्रसिका) और आमाशय
निगला हुआ ग्रास-नली अथवा ग्रसिका में जाता है। ग्रसिका गले एवं वक्ष से होती हुई जाती है। ग्रसिका की भित्ति के संकुचन से भोजन नीचे की ओर सरकता जाता है।
आमाशय (Stomach)
आमाशय मोटी भित्ति वाली एक थैलीनुमा संरचना है। यह चपटा एवं ‘J’ की आकृति का होता है तथा आहार नाल का सबसे चौड़ा भाग है। आमाशय का आंतरिक अस्तर (सतह) श्लेष्मल, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा पाचक रस स्रावित करता है।
- श्लेष्मल: आमाशय के आंतरिक अस्तर को सुरक्षा प्रदान करता है।
- अम्ल: अनेक जीवाणुओं को नष्ट करता है तथा माध्यम को अम्लीय बनाता है।
- पाचक रस (जठर रस): यह प्रोटीन को सरल पदार्थों में विघटित कर देता है।
📘 क्षुद्रांत्र (छोटी आँत)
क्षुद्रांत्र लगभग 7.5 मीटर लंबी अत्यधिक कुंडलित नली है। यह यकृत एवं अग्न्याशय से स्राव प्राप्त करती है। इसके अतिरिक्त इसकी भित्ति से भी कुछ रस स्रावित होते हैं।
महत्वपूर्ण ग्रंथियाँ (Important Glands):
- यकृत (Liver): यह गहरे लाल-भूरे रंग की ग्रंथि है, जो शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है। यह पित्त रस (Bile Juice) स्रावित करती है, जो ‘पित्ताशय’ (Gallbladder) में संग्रहित होता है। पित्त रस वसा के पाचन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- अग्न्याशय (Pancreas): यह हल्के पीले रंग की बड़ी ग्रंथि है, जो आमाशय के ठीक नीचे स्थित होती है। ‘अग्न्याशयिक रस’ कार्बोहाइड्रेट्स एवं प्रोटीन पर क्रिया करता है तथा इनको उनके सरल रूप में बदल देता है।
आंशिक रूप से पचा भोजन अब क्षुद्रांत्र के निचले भाग में पहुँचता है जहाँ आंत्र रस पाचन क्रिया को पूर्ण कर देता है। कार्बोहाइड्रेट सरल शर्करा जैसे कि ग्लूकोस में परिवर्तित हो जाते हैं। ‘वसा’, वसा अम्ल एवं ग्लिसरॉल में तथा ‘प्रोटीन’, ऐमीनो अम्ल में परिवर्तित हो जाती है।
पचा हुआ भोजन अवशोषित होकर क्षुद्रांत्र की भित्ति में स्थित रुधिर वाहिकाओं में चला जाता है। इस प्रक्रम को अवशोषण (Absorption) कहते हैं।
दीर्घरोम (Villi) क्या हैं?
क्षुद्रांत्र की आंतरिक भित्ति पर अँगुली के समान उभरी हुई संरचनाएँ होती हैं, जिन्हें दीर्घरोम अथवा रसांकुर (Villi) कहते हैं। दीर्घरोम पचे हुए भोजन के अवशोषण हेतु तल क्षेत्र (Surface Area) बढ़ा देते हैं। प्रत्येक दीर्घरोम में सूक्ष्म रुधिर वाहिकाओं का जाल फैला रहता है, जहाँ से पचे हुए भोजन का अवशोषण होता है।
अवशोषित पदार्थों का स्थानांतरण रुधिर वाहिकाओं द्वारा शरीर के विभिन्न भागों तक होता है, जहाँ उनका उपयोग जटिल पदार्थों को बनाने में किया जाता है। इस प्रक्रम को स्वांगीकरण (Assimilation) कहते हैं। कोशिकाओं में उपस्थित ग्लूकोस का विघटन ऑक्सीजन की सहायता से कार्बन डाइऑक्साइड एवं जल में हो जाता है और ऊर्जा मुक्त होती है। भोजन का वह भाग, जिसका पाचन या अवशोषण नहीं हो पाता, बृहदांत्र में भेज दिया जाता है।
📘 बृहदांत्र (बड़ी आँत)
बृहदांत्र, क्षुद्रांत्र की अपेक्षा चौड़ी एवं छोटी होती है। यह लगभग 1.5 मीटर लंबी होती है।
कार्य: इसका मुख्य कार्य जल एवं कुछ लवणों का अवशोषण करना है। बचा हुआ अपचित पदार्थ मलाशय (Rectum) में चला जाता है तथा अर्धठोस मल के रूप में रहता है। समय-समय पर गुदा (Anus) द्वारा यह मल बाहर निकाल दिया जाता है। इसे निष्कासन (Egestion) कहते हैं।
क्या आपने गाय, भैंस तथा घास खाने वाले अन्य जंतुओं को देखा है? वे उस समय भी लगातार जुगाली करते रहते हैं, जब वे खा न रहे हों। वास्तव में वे पहले घास को जल्दी-जल्दी निगलकर आमाशय के एक भाग में भंडारित कर लेते हैं। यह भाग रूमेन (Rumen) या प्रथम आमाशय कहलाता है।
रूमिनैन्ट में आमाशय चार भागों में बँटा होता है। रूमेन में भोजन का आंशिक पाचन होता है, जिसे जुगाल (कड) कहते हैं। परंतु बाद में जंतु इसको छोटे पिंडकों के रूप में पुनः मुख में लाता है तथा जिसे वह चबाता रहता है। इस प्रक्रम को रोमन्थन (जुगाली करना) कहते हैं तथा ऐसे जंतु रूमिनैन्ट अथवा रोमन्थी कहलाते हैं।
सेलुलोस का पाचन:
घास में सेलुलोस (Cellulose) की प्रचुरता होती है, जो एक प्रकार का कार्बोहाइड्रेट है। रूमिनैन्ट पशुओं के रूमेन में सेलुलोस का पाचन करने वाले जीवाणु पाए जाते हैं। बहुत-से जंतु एवं मानव सेलुलोस का पाचन नहीं कर पाते क्योंकि उनमें ये जीवाणु नहीं होते। जानवरों जैसे घोड़ा, खरगोश आदि में क्षुद्रांत्र एवं बृहदांत्र के बीच एक थैलीनुमा बड़ी संरचना होती है जिसे अंधनाल (Caecum) कहते हैं, जहाँ सेलुलोस का पाचन होता है।
📘 2.4 अमीबा में संभरण एवं पाचन
अमीबा जलाशयों में पाया जाने वाला एक एककोशिक (Unicellular) जीव है। अमीबा की कोशिका में एक कोशिका झिल्ली होती है, एक गोल सघन केंद्रक एवं कोशिका द्रव्य में बुलबुले के समान अनेक धानियाँ होती हैं। अमीबा निरंतर अपनी आकृति एवं स्थिति बदलता रहता है।
चित्र 2.10 : अमीबा में संभरण एवं पाचन प्रक्रिया।
पादाभ (Pseudopodia) और खाद्य धानी
अमीबा एक अथवा अधिक अँगुली के समान प्रवर्ध निकालता रहता है, जिन्हें पादाभ (कृत्रिम पाँव / Pseudopodia) कहते हैं। ये इन्हें गति देने एवं भोजन पकड़ने में सहायता करते हैं।
अमीबा सूक्ष्म जीवों का आहार करता है। जब इसे भोजन का आभास होता है, तो यह खाद्य कण के चारों ओर पादाभ विकसित करके उसे निगल लेता है। खाद्य पदार्थ उसकी खाद्य धानी (Food vacuole) में फँस जाते हैं। खाद्य धानी में ही पाचक रस स्रावित होते हैं, जो भोजन को सरल पदार्थों में बदल देते हैं। पचा हुआ खाद्य अवशोषित हो जाता है और अपशिष्ट खाद्य धानी द्वारा बाहर (बहिक्षेपित) निकाल दिया जाता है।
📘 अभ्यास प्रश्न – Bihar Board Class 7 Science Chapter 2 Solutions
उत्तर:
- (क) मानव पोषण के मुख्य चरण अंतर्ग्रहण, पाचन, अवशोषण, स्वांगीकरण एवं निष्कासन हैं।
- (ख) मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि का नाम यकृत है।
- (ग) आमाशय में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल एवं पाचक रस (जठर रस) का स्राव होता है, जो भोजन पर क्रिया करते हैं।
- (घ) क्षुद्रांत्र की आंतरिक भित्ति पर अँगुली के समान अनेक प्रवर्ध होते हैं, जो दीर्घरोम (रसांकुर) कहलाते हैं।
- (च) अमीबा अपने भोजन का पाचन खाद्य धानी में करता है।
(क) मंड का पाचन आमाशय से प्रारंभ होता है।
उत्तर: (F) असत्य
व्याख्या: मंड (कार्बोहाइड्रेट) का पाचन मुख-गुहिका में ही लाला रस (लार) की सहायता से प्रारंभ हो जाता है।
(ख) जीभ लाला-ग्रंथि को भोजन के साथ मिलाने में सहायता करती है।
उत्तर: (F) असत्य
व्याख्या: जीभ लाला-ग्रंथि को नहीं, बल्कि ग्रंथि द्वारा स्रावित ‘लाला रस’ (लार) को भोजन के साथ मिलाने का कार्य करती है।
(ग) पित्ताशय में पित्त रस अस्थायी रूप से भंडारित होता है।
उत्तर: (T) सत्य
व्याख्या: यकृत (Liver) द्वारा बनाया गया पित्त रस पित्ताशय (Gallbladder) नामक थैली में ही अस्थायी रूप से जमा होता है।
(घ) रूमिनैन्ट निगली हुई घास को अपने मुख में वापस लाकर धीरे-धीरे चबाते रहते हैं।
उत्तर: (T) सत्य
व्याख्या: घास खाने वाले जंतु निगले हुए भोजन (कड) को वापस मुँह में लाकर चबाते हैं, जिसे रोमन्थन (जुगाली करना) कहते हैं।
(क) वसा का पूर्णरूपेण पाचन जिस अंग में होता है, वह है-
- (i) आमाशय
- (ii) मुख
- ✅ (iii) क्षुद्रांत्र
- (iv) बृहदांत्र
उत्तर की विस्तृत व्याख्या: क्षुद्रांत्र (छोटी आँत) में यकृत से पित्त रस और अग्न्याशय से अग्न्याशयिक रस मिलते हैं, जो वसा को पूरी तरह से वसा अम्ल और ग्लिसरॉल में तोड़ देते हैं।
(ख) जल का अवशोषण मुख्यतः जिस अंग द्वारा होता है, वह है-
- (i) आमाशय
- (ii) ग्रसिका
- (iii) क्षुद्रांत्र
- ✅ (iv) बृहदांत्र
उत्तर की विस्तृत व्याख्या: जब अपचित भोजन बृहदांत्र (बड़ी आँत) में पहुँचता है, तो इसकी दीवारें उसमें से अतिरिक्त जल और कुछ महत्वपूर्ण लवणों को अवशोषित कर लेती हैं।
उत्तर:
| कॉलम A (खाद्य घटक) | कॉलम B (पाचन के उत्पाद) |
|---|---|
| कार्बोहाइड्रेट्स | शर्करा |
| प्रोटीन | ऐमीनो अम्ल |
| वसा | वसा अम्ल एवं ग्लिसरॉल |
उत्तर: क्षुद्रांत्र (छोटी आँत) की आंतरिक भित्ति पर अँगुली के समान उभरी हुई अनेक सूक्ष्म संरचनाएँ होती हैं, जिन्हें दीर्घरोम या रसांकुर (Villi) कहते हैं।
- कहाँ पाए जाते हैं: ये क्षुद्रांत्र (छोटी आँत) में पाए जाते हैं।
- कार्य: दीर्घरोम पचे हुए भोजन के अवशोषण के लिए आंत्र का तल क्षेत्र (Surface Area) बढ़ा देते हैं। इनमें सूक्ष्म रुधिर वाहिकाओं का जाल होता है जो पचे हुए भोजन को अवशोषित कर शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाता है।
उत्तर: पित्त रस यकृत (Liver) में निर्मित होता है और यह पित्ताशय (Gallbladder) नामक थैली में संग्रहित रहता है। यह भोजन में उपस्थित वसा (Fat) के पाचन में महत्वपूर्ण सहायता करता है।
उत्तर: उस कार्बोहाइड्रेट का नाम सेलुलोस (Cellulose) है, जो घास में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
कारण: रूमिनैन्ट (जैसे- गाय, भैंस, हिरण) जंतुओं के रूमेन (प्रथम आमाशय) और अंधनाल में कुछ विशेष प्रकार के जीवाणु पाए जाते हैं, जो सेलुलोस को पचाने की क्षमता रखते हैं। मानव के आहार नाल में ये विशेष जीवाणु अनुपस्थित होते हैं, इसी कारण मनुष्य सेलुलोस का पाचन नहीं कर सकता।
उत्तर: ग्लूकोस कार्बोहाइड्रेट का सबसे सरलतम रूप है। इसे हमारे शरीर के पाचन तंत्र द्वारा और अधिक विखंडित (तोड़ने) करने की आवश्यकता नहीं होती है। यह सीधे हमारी क्षुद्रांत्र द्वारा रक्त में अवशोषित हो जाता है और ऑक्सीजन की मदद से कोशिकाओं में तुरंत विघटित होकर ऊर्जा (Energy) मुक्त करता है। इसीलिए थकावट होने पर ग्लूकोस पीने से तुरंत ऊर्जा मिलती है।
उत्तर:
- (i) पचे भोजन का अवशोषण – क्षुद्रांत्र (छोटी आँत)
- (ii) भोजन को चबाना – मुख-गुहिका (दाँत)
- (iii) जीवाणु नष्ट करना – आमाशय (हाइड्रोक्लोरिक अम्ल द्वारा)
- (iv) भोजन का संपूर्ण पाचन – क्षुद्रांत्र (छोटी आँत)
- (v) मल का निर्माण – बृहदांत्र (बड़ी आँत) / मलाशय
उत्तर:
- समानता: दोनों में ही जटिल खाद्य पदार्थों को पाचक रसों की सहायता से सरल पदार्थों में तोड़ा जाता है और उससे ऊर्जा प्राप्त की जाती है।
- अंतर: मानव में भोजन ग्रहण करने और पचाने के लिए एक बहुत ही जटिल और विकसित पाचन तंत्र (मुख, आमाशय, आँत आदि) होता है। जबकि, अमीबा एक एककोशिकीय जीव है, इसमें न तो मुख होता है और न ही विकसित पाचन तंत्र; यह पादाभ (Pseudopodia) से भोजन पकड़ता है और इसका पाचन खाद्य धानी के अंदर होता है।
उत्तर:
| कॉलम A | कॉलम B (सही मिलान) |
|---|---|
| (क) लाला-ग्रंथि | (iii) लाला रस स्रावित करना |
| (ख) आमाशय | (iv) अम्ल का निर्मोचन |
| (ग) यकृत | (i) पित्त रस का स्रवण |
| (घ) मलाशय | (vii) मल त्याग / (ii) बिना पचे भोजन का भण्डारण |
| (च) क्षुद्रांत्र | (v) पाचन का पूरा होना |
| (छ) बृहदांत्र | (vi) जल का अवशोषण |
उत्तर: छात्रों, मानव पाचन तंत्र के आरेख में ऊपर से नीचे की ओर क्रमशः इन अंगों को नामांकित करें:
- मुख-गुहिका (सबसे ऊपर)
- ग्रसिका (भोजन नली)
- यकृत और पित्ताशय (दाहिनी ओर)
- आमाशय (बाईं ओर ‘J’ आकार की थैली)
- अग्न्याशय (आमाशय के ठीक नीचे)
- क्षुद्रांत्र (बीच में अत्यधिक कुंडलित नली)
- बृहदांत्र (क्षुद्रांत्र को घेरे हुए मोटी नली)
- मलाशय और अंत में गुदा।
शिक्षकों के लिए सुझाव: कक्षा में उबले हुए चावल और चबाए हुए चावल पर ‘आयोडीन परीक्षण’ (क्रियाकलाप 2.3) अवश्य कराएँ। इससे छात्रों को स्पष्ट रूप से समझ आ जाएगा कि लार (लाला रस) किस प्रकार मंड (स्टार्च) को शर्करा में बदल देती है। इसके अलावा, दाँतों के मॉडल या चार्ट के जरिए कृंतक, रदनक, अग्रचर्वणक और चर्वणक के बीच का अंतर समझाएँ।
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Suraj Kumar Mishra